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नवजात की देखभाल में छोटी गलती भी पड़ती है भारी-स्तनपान, सफाई और सही देखभाल से बच सकती हैं कई गंभीर बीमारियां :डॉ. रश्मि गुप्ता

नोएडा। नवजात शिशु की देखभाल में थोड़ी सी लापरवाही भी गंभीर बीमारी का कारण बन सकती है। बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के बाद के पहले छह महीने शिशु के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान सही स्तनपान, स्वच्छता और संक्रमण से बचाव ही बच्चे के स्वस्थ भविष्य की नींव रखते हैं। यह बातें फेलिक्स हॉस्पिटल की एमडी और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रश्मि गुप्ता ने कहीं।

उन्होंने बताया कि जन्म के एक घंटे के भीतर मां का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) नवजात के लिए अमृत के समान होता है। इसमें मौजूद एंटीबॉडी बच्चे को कई तरह के संक्रमणों से बचाते हैं। पहले छह महीने तक केवल स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) की सलाह दी जाती है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और डायरिया, निमोनिया जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है।

नवजात की देखभाल में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। बच्चे को छूने से पहले हाथ धोना, कपड़े साफ रखना और घर का वातावरण स्वच्छ रखना जरूरी है। गंदगी और लापरवाही के कारण नवजात में बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण तेजी से फैल सकते हैं।

पहले छह महीने की अवधि में बच्चे को बाहर के लोगों के संपर्क से बचाना चाहिए। समय-समय पर टीकाकरण कराना अनिवार्य है। बच्चे को ठंड-गर्मी से बचाना, साफ कपड़े पहनाना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना जरूरी है।

नवजात में आमतौर पर डायरिया, निमोनिया, जॉन्डिस (पीलिया), त्वचा संक्रमण और सेप्सिस जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। नवजात शिशुओं में बीमारियों के मुख्य कारणों में गंदगी और अस्वच्छ वातावरण, मां का कुपोषण, समय पर स्तनपान न कराना, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना और समय पर टीकाकरण न होना शामिल हैं। इन कारणों से बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

ऐसे में अभिभावकों को लक्षणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जैसे—तेज बुखार या शरीर का ठंडा पड़ना, दूध न पीना या बार-बार उल्टी होना, सांस लेने में दिक्कत, त्वचा का पीला या नीला पड़ना तथा लगातार रोना या असामान्य सुस्ती।

डॉक्टरों के अनुसार, यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो तुरंत बच्चे को अस्पताल ले जाना चाहिए, क्योंकि थोड़ी सी देरी भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है। नवजात की बीमारी का इलाज हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए, क्योंकि घर पर बिना परामर्श दवा देना खतरनाक साबित हो सकता है।

हल्के संक्रमण की स्थिति में भी स्तनपान जारी रखना, साफ-सफाई बनाए रखना और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का समय पर सेवन जरूरी है, जबकि गंभीर मामलों में बच्चे को अस्पताल में भर्ती कर उचित इलाज कराना आवश्यक हो जाता है।

भारत में नवजात मृत्यु दर का बड़ा कारण संक्रमण और कुपोषण है। हर साल लाखों नवजात शिशु शुरुआती महीनों में ही बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, जिनमें से अधिकांश मामलों को सही देखभाल से रोका जा सकता है।

नवजात की देखभाल में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। सही जानकारी, समय पर स्तनपान और स्वच्छता अपनाकर बच्चे को स्वस्थ और सुरक्षित रखा जा सकता है।

नवजात में दिखने वाले प्रमुख लक्षण:

तेज बुखार या शरीर का असामान्य रूप से ठंडा पड़ना

दूध न पीना या बार-बार उल्टी करना

सांस लेने में दिक्कत या तेज/धीमी सांस चलना

त्वचा का पीला (पीलिया) या नीला पड़ना

लगातार रोना या असामान्य सुस्ती

शरीर में झटके (दौरे) आना

पेट फूलना या ढीलापन महसूस होना

आंखों या त्वचा में संक्रमण के लक्षण (लालिमा, पस)

पेशाब या मल त्याग में कमी या बदलाव

रोकथाम और बचाव:

जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू करें

केवल मां का दूध 6 महीने तक दें

हाथों और आसपास की सफाई रखें

समय पर टीकाकरण कराएं

बीमार व्यक्ति को बच्चे से दूर रखें

नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं

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