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हिंसा और उत्पीड़न के शिकार पशु आधिकार कार्यकर्ताओं ने सबूतों के साथ पेश किया हिंसक घटनाओं का ब्योरा

नोएडा। एनिमल एक्टिविस्ट्स ने खुलासा किया है कि देश में पशु क्रूरता में बढ़ोतरी के साथ-साथ पशु आधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा भी बढ़ रही है। नोएडा मीडिया क्लब में रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पशु अधिकार कार्यकर्ता व फ़िल्ममेकर संक्षय बब्बर, लोकप्रिय टीवी सेलेब्रिटी व पशु अधिकार कार्यकर्ता करुणा ने कहा कि आवारा जानवरों को हटाने के नाम पर आए सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों के बाद ज़मीनी स्तर पर जो स्थिति बनी है, वह गंभीर चिंता का विषय है। हाल के दिनों में स्ट्रीट डॉग फीडर्स के खिलाफ हिंसा, धमकी, झूठी शिकायतों और प्रशासनिक कार्रवाई में तेज़ी आई है। जानवरों के साथ उन नागरिकों का भी उत्पीड़न हो रहा है, जो बेज़ुबानों को भोजन देकर अपना मानवीय दायित्व निभा रहे हैं।

संक्षय बब्बर ने बताया कि उन महिलाओं के खिलाफ़ भी हिंसा हो रही है, जो जानवरों को खाना खिलाती हैं और उनकी रक्षा करती हैं। जो विवाद पहले कभी-कभार होते थे, वे अब भीड़ द्वारा हमलों, यौन हिंसा के प्रयासों और अमानवीय पशु क्रूरता में बदल चुके हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे लोग भी उपस्थित थे, जिन्हें बेज़ुबानों को खाने देने की वजह से उत्पीड़न का शिकार बनाया गया। टीवी सेलेब्रिटी व पशु अधिकार कार्यकर्ता करुणा ने वर्चुअली जुड़कर अपनी बात साझा की। इस दौरान वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, शिकायत पत्र, नोटिस, एफआईआर एवं अन्य दस्तावेज़ी सबूत प्रस्तुत किए गए। जैसे- राजधानी दिल्ली के हरिनगर की एक घटना में सामुदायिक कुत्ते की तलाश कर रही मां-बेटी को घेरकर पीटा गया, पानी से भिगोया गया, उन पर वस्तुएं फेंकी गईं और यौन हमले का प्रयास हुआ। दिल्ली की गीता कॉलोनी में एक महिला और उसकी 17 वर्षीय बेटी पर कुत्ते को खाना खिलाने के कारण लोहे की रॉड से हमला किया गया। यूपी के गाज़ियाबाद और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में महिला फीडर्स और उनके परिवारों पर सार्वजनिक रूप से हमले हुए।

संक्षय बब्बर ने बताया कि देश में पशु क्रूरता का एक स्पष्ट और डरावना पैटर्न सामने आया है, जिसमें कुत्तों की पीट-पीटकर हत्या, एसिड अटैक, सामूहिक ज़हर देना, पिल्लों को घसीटना या कुचलना, और नसबंदी किए गए कुत्तों को मरने के लिए छोड़ देने जैसी घटनाएं शामिल हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि महिला फीडर्स को निशाना बनाना, भीड़ मानसिकता और कानूनी फैसलों की गलत व्याख्या इस हिंसा को बढ़ा रही है, जबकि अदालत का हालिया निर्णय न तो फीडिंग पर रोक लगाता है और न ही किसी प्रकार की हिंसा को वैध ठहराता है। एनिमल एक्टिविस्ट्स ने दोषियों पर सख़्त कार्रवाई और महिला फीडर्स को तत्काल सुरक्षा देने की मांग की है।

बब्बर ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े संवैधानिक, कानूनी और मानवीय पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट में अभी सुनवाई भी चल रही है, जिस पर तथ्यात्मक और ज़मीनी सच्चाई सामने लाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। उन्होंने बताया कि पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा के अधिकांश मामले कभी दर्ज ही नहीं हो पाते। यह संकट 7 नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या के बाद और अधिक बढ़ गया है।

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