केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वाराणसी में आपातकाल के काले अध्याय पर पत्रकार वार्ता को किया संबोधित
वाराणसी/नई दिल्ली ll केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान शुक्रवार को एक दिवसीय दौरे पर वाराणसी पहुंचे। इस दौरान शिवराज सिंह ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन किए, वहीं शिवराज सिंह ने आपातकाल के काले अध्याय के 50 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान व संगोष्ठी कार्यक्रम में सहभागिता की। इसके अलावा, शिवराज सिंह ने आपातकाल की प्रदर्शनी का अवलोकन किया और पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। इस दौरान शिवराज सिंह ने कहा कि अपनी सत्ता बचाने की चाहत में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया, ना बाहरी सुरक्षा को कोई खतरा था, ना आंतरिक सुरक्षा को कोई खतरा था, खतरा था तो केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर, इसलिए 25 जून 1975 की रात कैबिनेट की बैठक किए बिना ही देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया।
तानाशाही, कांग्रेस के DNA में है:-
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उस काले दिन को 50 साल हो गए, जब देश में इमरजेंसी लगा दी गई थी। मेरी उम्र उस समय केवल 16 साल थी और मैं भी इमरजेंसी के दौरान डिफेंस ऑफ इंडिया रुल्स के अंतर्गत पकड़कर जेल ले जाया गया था, मैं एक स्कूल का प्रेसीडेंट था, वो काले दिन याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आपातकाल में अगर सनक आई कि, तुर्कमान गेट पर घर तोड़ दिए जाएँ तो जनता बुलडोज़र से रौंद दी गई थी। अगर किसी ने विरोध किया तो गोलियों से छलनी कर दिए गए थे। लोगों की हत्या लोकतंत्र में होती है… ये जनता पर गोली नहीं चली थी, ये संविधान की हत्या थी। जिस ढंग से नसबंदी हुई, बूढ़ों की नसबंदी कर दी गई, कुँवारों की नसबंदी कर दी गई। कोई अपील नहीं, कोई वकील नहीं, कोई दलील नहीं, ये संविधान की हत्या थी। सारे नागरिक अधिकार सस्पेंड कर दिए गए। प्रेस की स्वतंत्रता पर ताला डाल देना संविधान की हत्या है। न्यायालय के अधिकारों को कम कर देना, अप्रभावी बना देना – ये संविधान की हत्या थी। पूरे देश को जेलखाना बनाना – ये संविधान की हत्या थी। सारे विपक्षी दल और स्टूडेंट तक जेलों में ठूँस दिए गए। काँग्रेस संविधान की हत्यारी है… काँग्रेस को संविधान की प्रति रखने का अधिकारी नहीं है। वो काले दिन आज तक याद हैं, काँग्रेस के DNA में ही तानाशाही है। केवल कुर्सी बचाने के लिए। जो लोग संविधान की प्रति हाथ में लेकर घूमते हैं, उन्हें जवाब देना पड़ेगा।
लोकतंत्र भारतीय जनता पार्टी के स्वभाव में है:-
शिवराज सिंह ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान हज़ारों परिवार तबाह हो गए थे। 1 लाख से ज़्यादा लोग जेलों में बंद थे, और मैं जिस भोपाल जेल में था, उस समय हमारे जनसंघ के नेता थे हसमत वारसी जी, बहुत अच्छे वक्ता थे, युवा थे। वो जेल में हमारे सामने बीमार हुए, कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे। जेल के प्रशासन को हम हाथ जोड़-जोड़कर थक गए, लेकिन उन्हें इलाज के लिए बाहर नहीं ले जाया गया। अंत में उन्होंने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। खून की उल्टियाँ हुईं और जब अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने अंतिम साँस ली। जेल में लोगों को उल्टा लटकाया गया, बर्फ की सिल्लियों पर लिटाया गया, करंट लगाकर प्रताड़ित किया गया। ऐसे अमानवीय अत्याचार तो कभी अंग्रेजों ने भी नहीं किए थे। शिवराज सिंह ने कहा कि, कांग्रेस को लोकतंत्र सीखना है तो प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जी से सीखें। भारतीय जनता पार्टी लोकतंत्र की भावनाओं का आदर करती है, लेकिन कांग्रेस ने जो किया उसके लिए मैं फिर दोहरा रहा हूं कि उन्हें नाक रगड़कर देश से माफी मांगना चाहिए कि हमसे ये ऐतिहासिक गलती हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी लोकतंत्र को जीते हैं और इसलिए संविधान दिवस आजाद भारत में, मनाने का काम किया तो वो प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया, लोकतंत्र भारतीय जनता पार्टी के स्वभाव में है।
भारत का मूल भाव सर्वधर्म सद्भाव:-
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत अत्यंत प्राचीन और महान राष्ट्र है और भारत का मूल भाव सर्वधर्म सद्भाव है। ये भारत है जिसने आज नहीं हजारों साल पहले कहा “एकम सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” सत्य एक है विद्वान उसे अलग-अलग तरीके से कहते हैं, ये भारत है जो कहता है “मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना” अलग-अलग भाव का भी आदर करने वाला, उपासना पद्धति कोई हो। स्वामी विवेकानंद जी ने भी शिकागो में जाकर ये कहा था कि, किसी रास्ते चलो अंतत: पहुंचोगें परमपिता परमात्मा के ही पास। धर्मनिरपेक्ष हमारी संस्कृति का मूल नहीं है और इसलिए इस पर जरूर विचार होना चाहिए। दूसरी बात है समाजवाद की, आत्मवत सर्वभूतेषु अपने जैसा ही सबको मानो ये, भारत का मूल विचार है। “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”। यह सारी दुनिया ही एक परिवार है, यह भारत का मूल भाव है। जियो और जीने दो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, सर्वे भवन्तु सुखिना सर्वे संतु निरामया ये भारत का मूल भाव है और इसलिए यहां समाजवाद की भी जरूरत नहीं है। हम तो वर्षों पहले से कह रहे हैं, सियाराम मय सब जग जानी, सबको एक जैसा मानो, देश को इस पर निश्चित तौर पर विचार करना चाहिए।



