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डॉक्टर कॉन्क्लेव 2025 में डॉ. डी.के. गुप्ता ने साझा किया क्लीनिक से चेन ऑफ हॉस्पिटल तक का सफर

नोएडाः जयपुर स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में शनिवार को रूंगटा हॉस्पिटल की ओर से डॉक्टर कॉन्क्लेव का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में फेलिक्स हॉस्पिटल्स के चेयरमैन डॉ. डी.के. गुप्ता मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने इस अवसर पर अपने जीवन संघर्ष, डॉक्टर बनने के जुनून और एक छोटे से क्लीनिक से अस्पतालों की बड़ी श्रृंखला (चेन ऑफ हॉस्पिटल्स) खड़ी करने तक की कहानी साझा की।

डॉ. डी.के गुप्ता ने बताया कि किस तरह उन्होंने बचपन से ही लोगों की सेवा करने का सपना देखा और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उस सपने को साकार किया। यह सफर केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के एक छोटे से गांव में जन्म के बाद बचपन बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण रहा। पिता जिला पंचायत में कर्मचारी और मां प्राइमरी स्कूल शिक्षिका थीं। लेकिन परिवार के आर्थिक हालात कमजोर थे। सिर्फ 49 साल की उम्र में उनके पिता का निधन डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से हुआ, क्योंकि उस समय गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इस घटना ने भीतर तक झकझोर दिया। पिता के अंतिम संस्कार के समय उन्होंने प्रण लिया कि “वह उन लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे, जिन्हें आज इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि हिंदी माध्यम की पृष्ठभूमि के कारण उन्हें कई स्कूलों ने दाखिला देने से मना कर दिया। सरकारी स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें पढ़ने-लिखने के साथ-साथ कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने सड़कों के नीचे स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ाई की, बरामदों और गलियों में सोकर दिन गुजारे और पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए पॉपकॉर्न बेचे। एमबीबीएस में दाखिले के समय भी उन्हें कठिनाइयों से जूझना पड़ा। फॉर्म गायब हो गया, जिसके चलते उनका दाखिला रुक गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और हाई कोर्ट में केस लड़ा। अंततः मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से उन्हें मेरठ के एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में अपनी सीट वापस मिली। यहीं से उन्होंने एमबीबीएस और एमडी (पीडियाट्रिक्स) की पढ़ाई की और गोल्ड मेडल हासिल किए।

छोटे क्लीनिक से अस्पताल तक की नींव

संघर्षों से निकलने के बाद युवा डॉक्टर के तौर पर अपनी प्रैक्टिस की शुरुआत 2008 में आस्था क्लीनिक से की, जिसमें सिर्फ 15 बेड थे। कड़ी मेहनत और मरीजों की सेवा भावना के चलते धीरे-धीरे उनकी पहचान बनी। इसके बाद 2015 में अपनी पत्नी डॉ. रश्मि गुप्ता के साथ मिलकर फेलिक्स हॉस्पिटल की स्थापना की। शुरू में यह 50 बेड का अस्पताल था। लेकिन आज फेलिक्स हॉस्पिटल्स न केवल दिल्ली-एनसीआर बल्कि पूरे उत्तर भारत में तेजी से उभरता हुआ स्वास्थ्य संस्थान है। डॉ. डी.के गुप्ता ने बताया कि 2015 में 50 बेड से शुरू हुआ सफर आज 200 से ज्यादा ऑपरेशनल बेड तक पहुंच चुका है। अस्पताल ने एनएबीएच और एनएबीएल जैसे बड़े सर्टिफिकेशन हासिल किए हैं। वर्तमान में फेलिक्स हॉस्पिटल्स कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और ऑन्कोलॉजी जैसी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं उपलब्ध करा रहा है। आने वाले वर्षों में इसका विस्तार 850 से ज्यादा बेड तक करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है, बुजदिल खाक जिया करते हैं। उन्होंने बताया कि संघर्षों से भागना नहीं, बल्कि उनका सामना करना ही असली सफलता है। सपना है कि हर आम और गरीब परिवार तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें। विजन केवल एक अस्पताल चलाना नहीं बल्कि एक ऐसे स्वास्थ्य तंत्र का निर्माण करना है। जहां हर इंसान को समय पर और उचित इलाज मिल सके।

150 डॉक्टरों ने लिया हिस्सा, पुस्तक का हुआ विमोचनः

कॉन्क्लेव का विषय फ्रॉम क्लीनिक टू हॉस्पिटल्स, द जर्नी स्टार्ट्स हियर रहा। इस कार्यक्रम में राजस्थान के विभिन्न जिलों से 150 से अधिक युवा डॉक्टरों ने भागीदारी की। आयोजन का उद्देश्य युवा चिकित्सकों को यह मार्गदर्शन देना था कि कैसे वह अपने क्लीनिक से शुरुआत कर धीरे-धीरे अस्पताल मालिक बनने तक का सफर तय कर सकते हैं।

कॉन्क्लेव के एजेंडा में प्रमुख रूप से ‘हाउ टू ग्रो योर प्रैक्टिस एंड एनेबल योर जर्नी टू बी अ हॉस्पिटल ओनर’ विषय पर पैनल चर्चा हुई। कार्यक्रम के दौरान एक विशेष पुस्तक का विमोचन भी किया गया। वहीं डेंगू जागरूकता को लेकर घोषणा की गई। युवा डॉक्टरों ने इंटरैक्टिव सत्र में वक्ताओं से सवाल पूछकर अपने संदेह दूर किए। रूंगटा हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक श्री राश बिहारी रूंगटा ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य युवाओं को प्रेरित करना और चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार करना है।

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